1. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष(International Monetary Fund)
परिचय: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) एक अंतरसरकारी संगठन है जिसकी स्थापना अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विनिमय दर को स्थिर करने के लिए की गई थी। यह सदस्य देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर्याप्त तरलता के माध्यम से उनके भुगतान संतुलन (बीओपी) में सुधार में मदद करता है, वैश्विक मौद्रिक सहयोग में बढ़ोतरी को बढ़ावा देता है।
स्थापना: 1945 में
मुख्यालय : वाशिंगटन डी.सी.
सदस्य देश (2016 तक) : 189
मैनेजिग डायरेक्टर : क्रिश्चिन लगार्डे
आईएमएफ का उद्देश्यः आईएमएफ के समझौते के अनुच्छेदों के अनुसार इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं–
i. अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना।
ii. संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुनिश्चित करना।
iii.विनिमय दर की स्थिरता सुनिश्चित करना।
iv. बहुपक्षीय भुगतान प्रणाली (system of multilateral payments) को बढ़ावा देकर विनिमय प्रतिबंधों को समाप्त या कम करना।
v. भुगतान के प्रतिकूल संतुलन को समाप्त करने के लिए सदस्य देशों को आर्थिक सहायता प्रदान करना।
vi. अंतरराष्ट्रीय व्यापार की मात्रा और अवधि के असंतुलन को कम करना।
आईएमएफ के कार्य:-
आईएमएफ का प्राथमिक काम अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली– विनिमय दरों और अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की वह प्रणाली जो देशों (और वहां के लोगों) को एक दूसरे के साथ कारोबार करने में सक्षम बनाता है, की स्थिरता सुनिश्चित करना है।
पेट्रोलियम निर्यातक राष्ट्र संगठन ( Organization of the Petroleum Exporting Countries - OPEC)
परिचय: यह संगठन विश्व के अधिकांश तेल निर्यातक देशों को एकजुट करता है जिसका उद्देश्य इन देशों की पेट्रोलियम नीतियों में समन्वय स्थापित करना तथा उन्हें तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान करना है।
मुख्यालय: विएना (ऑस्ट्रिया)।
सदस्यता : अल्जीरिया, अंगोला, इक्वेडोर, ईरान, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला।
[इक्वेडोर, जिसकी सदस्यता वर्ष 1992 में निलम्बित कर दी गई थी, को 2007 में पुनः शामिल कर लिया गया। इंडोनेशिया सदस्य था लेकिन वर्ष 2008 में इसे निलम्बित कर दिया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका इराक के औपचारिक गठन के दौरान इसका सदस्य था।]
आधिकारिक भाषा: अंग्रेजी
स्थापना : 1960 में बगदाद
उद्देश्य: ओपेक के प्रमुख उद्देश्य हैं-सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों में समन्वय स्थापित करना तथा एकीकरण लाना; आतंरिक तेल मूल्यों के स्थिरीकरण के लिए युक्ति ढूंढना ताकि हानिकारक और अनावश्यक मूल्यों और आपूर्ति में उतार-चढ़ाव समाप्त हो सके।
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organization - NATO)
परिचय: यह संगठन राजनीतिक, सैनिक, आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में सहयोग एवं परामर्श के माध्यम से यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 28 देशों को उनकी सामूहिक सुरक्षा के लिये एकजुट करता है।
औपचारिक नाम: ऑर्गेनाइजेशन डू ट्रेटे डी आई अटलांटिके नॉर्ड (ओटीएएन) (Organisationdu Traite de I'Atlantique Nord–OTAN)
स्थापना : 4 मार्च 1949
मुख्यालय: ब्रुसेल्स (बेल्जियम)
सदस्यता: अम्बनिया, बेल्जियम बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्टोनिया, फ़्रांस, जर्मनी, यूनान, हंगरी, आइसलैंड, इटली, लिथुआनिया, लाटविया, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नार्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका।
शांति सहभागिता हेतु भागीदार देश: आर्मेनिया, आस्ट्रिया, अजरबैजान, बेलारूस, बोस्निया-हर्जेगोविना, मिस्र, फ़िनलैंड, जार्जिया, इजरायल, आयरलैंड, जॉर्डन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मेसिडोनिया, माल्डोवा, माल्टा, मारिटानिया, रूस, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, ताजीकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, सर्बिया, ट्यूनीशिया, मोंटेनेग्रो, मोरक्को, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान।
[बुल्गारिया, एस्टोनिया, लाटविया एवं लिथुआनिया वर्ष 2004 में शामिल हुए जबकि अल्बानिया और क्रोएशिया 2009 में नाटो में शामिल हुए।]
आधिकारिक भाषाएं: अंग्रेजी और फ्रांसीसी।
उद्देश्य: 1. यूरोप पर आक्रमण के समय अवरोधक की भूमिका निभाना।
2. सोवियत संघ के पश्चिम यूरोप में तथाकथित विस्तार को रोकना तथा युद्ध की स्थिति में लोगों को मानसिक रूप से तैयार करना।
3. पश्चिमी यूरोप के देशों को एक सूत्र में संगठित करना सैन्य तथा आर्थिक विकास के लिए अपने कार्यक्रमों द्वारा यूरोपीय राष्ट्रों के लिए सुरक्षा प्रदान करना।
4. इस प्रकार नाटो का उद्देश्य “स्वतंत्र विश्व” की रक्षा के लिए साम्यवाद के प्रसार को रोकना माना गया।
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